काला धन: इतिहास और नीतियाँ

यह लेख भारत में काले धन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके प्रमुख स्रोतों और नीति-स्तरीय प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करता है। इसमें नोटबंदी, कर सुधार, और अंतरराष्ट्रीय सूचना-साझाकरण जैसी पहलों से मिली सीख को व्याख्यायित किया गया है। लेख का उद्देश्य पाठकों को यह समझाना है कि भारत ने काले धन से निपटने के लिए कौन-कौन से उपाय अपनाए हैं और भविष्य की दिशा क्या हो सकती है।

Oct 26, 2025 - 11:26
Oct 30, 2025 - 14:35
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काला धन: इतिहास और नीतियाँ

काला धन: इतिहास और नीतियाँ

परिचय

काला धन उस आय को कहा जाता है जो कर या कानूनी दायित्वों से बचने के लिए छिपाई जाती है। यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय से एक चुनौती रही है, जो समानांतर नकद अर्थव्यवस्था का निर्माण करती है और कर-आधार को कमजोर करती है।

काले धन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में काले धन की जड़ें स्वतंत्रता-पूर्व काल से देखी जा सकती हैं, जब अनौपचारिक व्यापार और नकद लेनदेन आम थे। 1950–1970 के दशकों में कर दरें बहुत अधिक होने और नियामकीय ढांचे के कठोर होने के कारण टैक्स चोरी व हवाला जैसे माध्यमों ने जगह बनाई।

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी, विदेशी खातों और रियल एस्टेट में निवेश के माध्यम से काले धन का प्रवाह जारी रहा।

काले धन के प्रमुख स्रोत

  • अघोषित व्यापारिक लेनदेन और नकद आधारित अर्थव्यवस्था।
  • हवाला नेटवर्क और ऑफशोर खातों का उपयोग।
  • राजनीतिक फंडिंग और अघोषित चुनावी खर्च।
  • रियल एस्टेट में अंडर-रिपोर्टेड मूल्यांकन।
  • सोनाचांदी और बहुमूल्य वस्तुओं में नकद निवेश।

नीति प्रतिक्रियाएँ और सरकारी पहल

नोटबंदी (2016) — उच्च मूल्यवर्ग के ₹500 और ₹1000 के नोटों को रद्द कर सरकार ने नकद आधारित काले धन को उजागर करने का प्रयास किया। इससे डिजिटल भुगतान और औपचारिक अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई, हालांकि नकद वापसी की गति और आर्थिक प्रभाव पर बहस जारी रही।

आय घोषणा योजनाएँ — जैसे 1997 की स्वैच्छिक घोषणा योजना (VDIS) और 2016 की आय घोषणा योजना (IDS) ने नागरिकों को कर सहित अपनी अघोषित आय घोषित करने का अवसर दिया।

काला धन (अघोषित विदेशी आय और परिसंपत्तियाँ) अधिनियम, 2015 — विदेशी खातों और संपत्तियों पर नियंत्रण के लिए कठोर दंड और खुलासा प्रावधान।

बेनामी संपत्ति निषेध अधिनियम — फर्जी नामों पर रखी गई संपत्ति के स्वामित्व और लेनदेन पर नियंत्रण।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग — OECD के कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड (CRS) और FATCA जैसे ढाँचों के तहत सूचनाओं का स्वचालित आदान-प्रदान।

नोटबंदी से मिली प्रमुख सीख

  • केवल नकद निष्क्रिय करने से काले धन की जड़ नहीं मिटती, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा परिसंपत्तियों में होता है।
  • डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने और कर आधार विस्तारित करने से दीर्घकालिक पारदर्शिता बढ़ती है।
  • नियामक और तकनीकी निगरानी (AI आधारित एनालिटिक्स, PAN-Aadhaar लिंकिंग) आवश्यक है।

कर प्रवर्तन उपकरण

भारत सरकार और आयकर विभाग ने काले धन से निपटने के लिए कई तकनीकी और नीतिगत उपकरण लागू किए हैं:

  • डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से संदिग्ध लेनदेन की पहचान।
  • TDS/TCS और GST नेटवर्क के माध्यम से ट्रांज़ैक्शन ट्रेसबिलिटी।
  • PAN और आधार एकीकरण से पहचान सत्यापन।
  • स्वत: सूचना-साझाकरण समझौते (AEOI) के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय डेटा प्राप्ति।

आर्थिक प्रभाव

काला धन समान अवसर और संसाधनों के वितरण में असंतुलन लाता है। यह निवेश और राजस्व दोनों को प्रभावित करता है। नीति सुधारों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और कर अनुपालन को सहज बनाना है।

निष्कर्ष

काले धन से लड़ाई दीर्घकालिक है। कर पारदर्शिता, डिजिटलाइजेशन, और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही स्थायी समाधान हैं। नागरिक स्तर पर ईमानदार कर भुगतान और जवाबदेही का विस्तार जरूरी है।

संदर्भ-सूची (चयनित)

वित्त मंत्रालय, भारत सरकार — "काला धन और विदेशी संपत्ति पर श्वेत पत्र" (2012)।

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया — नोटबंदी रिपोर्ट (2017)।

OECD — कॉमन रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड दस्तावेज़।

CBDT वार्षिक रिपोर्ट्स।

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